खुशखबरी- वैज्ञानिकों ने निकाला कोरोना को खत्म करने का अनोखा तोड़, अब ऐसे मरेगा वायरस

कल्याण आयुर्वेद- कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा कर रखा है. इस वायरस से लाखों की संख्या में लोग संक्रमित हैं तो वही कई लोगों की जान भी जा सकती है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि आप इंसानी शरीर में ही कोरोनावायरस की कब्र खोदने की तैयारी चल रही है.
खुशखबरी- वैज्ञानिकों ने निकाला कोरोना को खत्म करने का अनोखा तोड़, अब ऐसे मरेगा वायरस
वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को कोरोना हरा देता है. इसलिए अब हमारी प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाकर इसे मात देने का काम बस पूरा होने ही जा रहा है.
दुनिया में कोरोनावायरस की कहानी के लिए हर जगह प्लॉट तैयार हो रहे हैं. लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना हमारे शरीर को ढाल बनाकर हमारे साथ लुकाछिपी करता है. इसलिए उसे बाहर से खोजना और फिर मारना भारी पड़ रहा है. ऐसे में अब कोरोनावायरस को खत्म करने के लिए नया प्लान तैयार हो चुका है. अब शरीर पर पावर को जगाकर कोरोना की किसी ढाल को उसकी कब्र बना दिया जाएगा.
हमारी प्रतिरोधी क्षमता यूं तो किसी भी बीमारी के खिलाफ खुद को तैयार कर उससे मुकाबला करती है. लेकिन कोरोना का वायरस इतनी तेजी से हमला करता है कि हमारे शरीर में एंटी वायरस बन ही नहीं पाते हैं. मतलब हमारे शरीर में प्रतिरोध की ताकत बहुत धीमी गति से बनती है. लेकिन इस वायरस का हमला बहुत तेज होता है. इसलिए अब हमारे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता यानी इम्यून को मजबूत कर कोरोना वायरस से युद्ध जीता जाएगा.
अमेरिका की जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ द मेडिसिन से बड़ी उम्मीद सामने आई है. दुनिया के सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक बड़ा क्लीनिकल ट्रायल कर रहे हैं. यहां कई लोगों पर खास दवा का प्रयोग चल रहा है. जिसका नाम अल्फा ब्लॉकर्स है, माना जा रहा है कि यह दवा कोरोना के वायरस की तेज गति को टक्कर दे सकती है यानि की बीमारी के बिगड़ने से पहले ही शरीर को एक्टिव कर उसके प्रभाव को रोक सकती है.
अमेरिका की जॉनसन हापकिंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च-
* अल्फा ब्लॉकर्स दवा से होगा कोरोना का इलाज.
* वॉलिंटियर्स पर चल रहा है ट्रायल.
* 45 से 85 साल के वॉलिंटियर्स शामिल.
* शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को करेगी मजबूत ( सुपर एक्टिव ).
* वायरस का संक्रमण ज्यादा फैलने से पहले होगा असर.
* श्वसन तंत्र में सूजन और ज्यादा संक्रमण से पहले ही ठीक होगा शरीर.
* चूहों पर हो चुका है सफल परीक्षण.
वैज्ञानिकों को जॉन्स हॉपकिंस अस्पताल में 45 से 50 वर्ष की उम्र के बीच कोविड-19 पर चल रहे ट्रायल के लिए वॉलिंटियर्स की तलाश है. मतलब जो वॉलिंटियर्स वेंटीलेटर पर या आईसीयू में ना हो. क्योंकि इस रिसर्च का मकसद ही कम संक्रमण वाले रोगियों के शरीर में से बीमारी को घातक होने से पहले ही ठीक कर देना है.
अल्फा ब्लॉकर्स का इस्तेमाल शरीर की इम्यून सिस्टम को ओवर एक्टिव कर देता है. यह देखा जा रहा है कि यह दवा शरीर में कोविड-19 से संक्रमण के ज्यादा फैलने से पहले क्या फेफड़ों और श्वसन नली की सूजन को रोक सकती है और क्या इस दवा से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से एक्टिव होकर इस संक्रमण से लड़ सकती है.
जिन लोगों पर यह रिसर्च चल रहा है उनका इलाज जिस दवा से किया जा रहा है वह कोई नई दवा नहीं है अल्फा ब्लॉकर्स से पहले भी इलाज होता रहा है. इसका काम शरीर में संक्रमण ज्यादा फैलने से पहले ही शरीर की इम्युनिटी को हाइपर एक्टिव कर बीमारी से लड़ने के लिए होता है. शरीर में संक्रमण ज्यादा पहले उससे पहले ही शरीर की इम्युनिटी को सुपरएक्टिव बीमारी से लड़ने के लायक बना देता है.
चूहों पर इस दवा का परीक्षण सफल रहा है. जानकार मानते हैं कि अगर यह दवा असरदार रही तो फिर लोगों को अस्पताल तक आने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. संसाधनों का दबाव कम होगा और मौत के आंकड़ों में भी कमी आएगी.
शरीर में जब संक्रमण का पहला पता मैक्रोफेज को लगता है, मैक्रोफेज से दूसरे प्रोटीन को पॉपीलाइन के रूप में चेतावनी यानी संदेश भेजते हैं.
जिसके बाद हमारे साइटोकींस यानी दूसरी प्रतिरोधी कोशिकाएं एंटीबॉडी को पैदा करती है. यह हमारे शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रणाली है. लेकिन खतरे की सिग्नल भेजने वाले मैक्रोफेज भेजने वाले दूसरे कैटेकोलामाइन एंटीबॉडी को बनाने की इस प्रक्रिया को और तेज कर देता है. इससे शरीर में और तेजी से एंटीबॉडी बनाने के संकेत जनरेट होते हैं. शरीर हाइपर एक्टिव तरीके से बीमारी के खिलाफ प्रतिरोध ही बन जाता है.
जिन लोगों पर ट्रायल चल रहे हैं उन पर 60 दिनों के लिए नजर रखी जाएगी, धीरे-धीरे उनके शरीर पर इस दवा की खुराक को बढ़ाया जाएगा. यह भी परखा जाएगा शरीर और उनके जैसे बीमार हुए लोगों मेसी क्या ट्रायल वाले मरीजों को वेंटीलेटर और आईसीयू की जरूरत कम पड़ी. मतलब क्या उनके शरीर ने खुद की यह लड़ाई लड़ ली. इस रिसर्च के शुरुआती नतीजे कुछ भी सप्ताहों में आने की उम्मीद है. सबसे बड़ी चुनौती साइड इफेक्ट को लेकर है इसलिए बेहद संतुलित तरीके से इस रिसर्च को आगे बढ़ाया जा रहा है.
कोरोनावायरस संक्रमण की दवा के लिए पूरी दुनिया में रिसर्च चल रही है. हर कोई अपने अपने तरीके से इंसानियत के दुश्मन इस वायरस की मौत का सामान तैयार करने में जुटा है. पूरी दुनिया इस पर आस लगाए बैठी है. ऐसे में अमेरिका के प्रसिद्ध जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी से ज्यादा उम्मीदें हैं. क्योंकि उनका शानदार इतिहास बताता है कि वह मेडिकल क्रांति के लिए कई बड़े काम अभी तक कर चुके हैं और कोरोना वायरस को लेकर उनका जो डाटा सेंटर है वह पूरी दुनिया में सबसे बेहतर माना जाता है. कोरोनावायरस बेसिक जानकारी के लिए आप में से कई लोगों ने वर्ल्डोमीटर नाम की वेबसाइट का इस्तेमाल किया है जो इसी जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी के डाटा सेटर की खोज है.
स्रोत- न्यूज़24 ऑनलाइन.

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