जानिए- किसने की छठ पूजा की शुरुआत और कौन है छठी मइया

छठ पर्व- हिंदू धर्म में छठ पर्व का विशेष महत्व है. छठ सिर्फ पर्व ही नहीं बल्कि महापर्व है जो पूरे 4 दिन तक चलता है. इसकी शुरुआत नहाय- खाय से होती है जो डूबता और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त किया जाता है. यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र मॉस में और दूसरी बार कार्तिक मास में. चैत्र शुक्ल पक्ष पर मनाए जाने वाले छठ को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है.

जानिए- किसने की छठ पूजा की शुरुआत और कौन है छठी मइया

यह पर्व पारिवारिक सुख समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए मनाया जाता है. छठ पर्व का एक अलग ही ऐतिहासिक महत्व भी है.

चलिए जानते हैं विस्तार से-

छठ पर्व की शुरुआत नहाए- खाए से होती है, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूरज को अर्घ और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा का समापन होता है.

किसने किया था छठ पूजा की शुरुआत-

छठ पूजा में सूर्य की पूजा का संबंध भगवान राम से भी माना जाता है क्योंकि दशहरा से लेकर छठ तक एक क्रम में मनाए जाने वाले त्योहार भगवान राम से ही जुड़े हुए हैं. दशहरे के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था इसके बाद दिवाली के दिन भगवान राम 14 वर्ष का वनवास खत्म करके अयोध्या लौटे, दिवाली से छठे दिन भगवान राम ने अपने कुल देवता की पूजा सरजू नदी में की थी. भगवान राम ने माता सीता के सरयू नदी में स्नान करने के बाद सूर्य देव को फल, मिष्ठान और अन्य चीजें अर्पित की थी. इसके बाद सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य दिया था और राजपाठ शुरू किया था. इसके बाद से आमजन भी सूर्य षष्ठी का पर्व मनाने लगे.

छठ पूजा के बारे में यह भी मान्यता है कि यह पर्व बिहार वासियों का मुख्य पर्व है. इसके पीछे कारण अंगराज कर्ण को माना जाता है. कर्ण अंग देश के राजा माने जाते हैं जो वर्तमान समय में भागलपुर के नाम से जाना जाता है जो बिहार में स्थित है. अंगराज कर्ण सूर्य देव की पूजा किया करते थे और पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया करते थे और जरूरतमंदों को दान भी दिया करते थे. मान्यताओं के अनुसार कार्तिक षष्ठी और सप्तमी के दिन भगवान सूर्य की विशेष आराधना किया करते थे. अपने राजा की भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे. धीरे-धीरे सूर्य देव की पूजा का विधान बिहार और पूरे पूर्वांचल क्षेत्र में हो गया. 

छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी प्रचलित है- कहा जाता है कि पांडव जब सारा राजपाट जुए में हार गए तब द्रोपती ने यह व्रत रखा था. इस व्रत से द्रोपती की सभी मनोकामनाएं पूरी हुई थी और फिर से राजपाट सब कुछ वापस मिल गया था. लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मैया का संबंध भाई- बहन का है. इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना शुभ फलदाई मानी गई है.

कौन है छठी मइया ?

पुराणों के अनुसार प्रियव्रत पहले मनु माने जाते हैं. जिनकी कोई भी संतान नहीं थी. प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा- तब कश्यप ऋषि ने पुत्रयेष्ठी यज्ञ करने के लिए कहा- इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया. पर यह पुत्र मरा हुआ जन्म लिया. मरे हुए पुत्र को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगे. तब ही एक आश्चर्यजनक घटना घटी. एक ज्योति रूप विमान पृथ्वी की ओर आता हुआ दिखाई दिया और पास आने पर सबने देखा कि उस विमान में एक दिव्य नारी बैठी हुई है.

उस दिव्य नारी ने प्रियव्रत से कहा कि मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हूँ. संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले को मैं संतान प्रदान करती हूं और देवी ने मृत बालक के शरीर का स्पर्श किया और बालक जीवित हो गया. इसके बाद प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की. देवी ने कहा- आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो. राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की. ब्रह्मवैभव पुरान में छठ व्रत का उल्लेख किया गया है.

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