जानें- आयुर्वेद के अनुसार क्या है सच्चे स्वास्थ्य की पहचान

कल्याण आयुर्वेद- बहुत से लोग भारी-भरकम शरीर को स्वास्थ्य मान लेते हैं. कुछ लोग सोचते हैं कि जिसके शरीर में किसी रोग के कीटाणु न हो वही स्वस्थ हैं. लेकिन यह दोनों बातें पूरी तरह से स्वास्थ्य की परिचायक नहीं है. आयुर्वेद में पूर्णता स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा निम्न है. वही मनुष्य पूर्ण पूरी तरह से स्वस्थ है जिसके शरीर में वात अर्थात स्नायुमंडल, पीत अर्थात पाचकाग्नि एवं रक्त संवहन और कफ अर्थात ओज ( जीव शक्ति ) और मलोत्सर्ग ये तीनों ही निश्चित अवस्था में बराबर- बराबर एक समान हो और तीनों प्रणालियों यथावत काम करती हो. जिसकी अग्नि सम हो अर्थात तीब्र या मंद न हो. जिससे खाए- पिए अन्नादि का पाचन ठीक से होता हो. समधातु अर्थात  जिसकी रस, रक्त,मांस,मज्जा आदि समस्त शरीर धतियें कम-ज्यादा न हो. जिसकी मल क्रिया अर्थात शरीरगत मालों को भीतर से बाहर निकालने वाली प्रणाली ठीक-ठाक से कार्य करती हो. जिससे पखाना, पेशाब, कफ और पसीना आदि यथा समय निकलते रहते हों. इसके साथ ही जिसकी आत्मा, मन और इंद्रियों प्रसन्न एवं संतोषी रहे वही स्थिति पूरी पूर्ण स्वस्थ्य की परिचायक है.

जानें- आयुर्वेद के अनुसार क्या है सच्चे स्वास्थ्य की पहचान
आयुर्वेद के मतानुसार मानव शरीर की रचना तत्वों में पंचमहाभूतों के अतिरिक्त आत्मा और मन को भी गिना जाता है. मानव शरीर मन प्रधान है. अतएव पूर्ण स्वास्थ्य में शरीर के साथ अंतःकरण का स्वस्थ होना भी परम आवश्यक होता है. शरीर तो हष्ट पुष्ट और सर्वथा कीटाणु रहित हो. मुख्य घटक सम हो. शारीरिक क्रियाएं भी नियमित हो. लेकिन अंतःकरण यदि स्वस्थ और प्रसन्न नहीं है तो उस मनुष्य को पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है. ऊपर से स्वस्थ सुखी दिखने वाला मनुष्य यदि भीतर से अशांत एवं दुखी है तो उसको यथार्थ में पूर्ण स्वस्थ कैसे माना जाएगा? पूर्ण स्वस्थ वही है जिसके शरीर में स्वस्थ और  सशक्त मन का निवास है.

स्रोत- आरोग्य प्रकाश.

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