शरीर के भीतरी इन अंगों की सफाई का रखें विशेष ध्यान, नही तो हो सकती है भयंकर रोग

कल्याण आयुर्वेद- मनुष्य-शरीर के भीतर अवयवों की स्वच्छता ही भीतरी सफाई है। यह मानव-शरीर एक इंजन के समान है। कोयले और पानी से इंजन को शक्ति प्राप्त होती है, किन्तु उसमें सारहीन पदार्थ-राख को नियमित रूप से बाहर निकालना पड़ता है। यदि उस सारहीन पदार्थ को इंजन में ही पड़ा रहने दें तो इंजन बहुत जल्द खराब हो जायगा। इसी प्रकार मनुष्य जो अन्न-पानी खाता-पीता है, उसका सार-तत्त्व खून बनकर शरीर के विभिन्न अवयवों में पहुँच जाता और निःसार पदार्थ पेट में पड़ा रह जाता है। शरीर के भीतर से निःसार मल पदार्थ को मल-मूत्र-पसीना आदि के रूप में बाहर निकालना आवश्यक होता है। यदि इन सारहीन पदार्थों को बाहर न निकाला जाय, तो शरीर रूपी इंजन खराब हो जायगा और कुछ दिनों के भीतर जीवन-गाड़ी का चलना रूक जाएगा। शरीर की स्वचालित मशीन अपना हर काम नियमित ढंग से स्वय करती है। यदि उसकी गति में बाधा न पड़े, तो वह अपनी सफाई अपने आप कर देती है। परन्तु आजकल हर मनुष्य को अपने कार्य उद्योग और व्यस्त समय की सुविधा के अधीन ही शरीर को चलाना पड़ता है, यही कारण है कि भीतरी सफाई से सम्बन्धित शारीरिक क्रियाओं के विषय में भिन्न-भिन्न मनुष्यों के विभिन्न समय और प्रकार चल पड़े हैं। अतएव इनकी जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है।

शरीर के भीतरी इन अंगों की सफाई का रखें विशेष ध्यान, नही तो हो सकती है भयंकर रोग

शरीर की मशीन अपने भीतरीय अंग प्रत्यंगों के सफाई का काम अपने आप करती ही है इसलिए हमें क्या करना ? ऐसा सोचना बिल्कुल भी उचित नहीं है हमारे अनियमितताओं की वजह से या रोगी होने पर शरीर की मशीन अपना नियमित काम विधिवत नहीं कर पाती जबकि हम शरीर को उसकी निश्चित अवस्था और नियमित गति से नहीं चलने देते और अपनी सुविधा से ही चलाते हैं तो हमारा यह भी कर्तव्य हो जाता है कि उसकी बाहरी- भीतरी सफाई से लिए हम उचित उपक्रम करके उसकी सहायता करें। 

हमारे चेस्टा से जिन भीतरी शरीर अंगों की सफाई हो सकती है उनमें आँते, गुर्दे और फेफड़े मुख्य है। इन अंगों की सफाई का ध्यान न रखने से शरीर को भयंकर हानि और रोग का होना निश्चित है।

स्रोत- आयुर्वेद गाइड. 

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