जानें- आयुर्वेद के अनुसार भोजन करने की विधि, बुढ़ापा में भी रहेंगे स्वस्थ और बलवान

कल्याण आयुर्वेद- भोजन कितना भी स्वादिष्ट, पौष्टिक और सुपाच्य हो. लेकिन भोजन के समय खाने वाला ईर्ष्या, क्रोध आदि विकारों से ग्रस्त है तो वह उत्तम भोजन भी व्यर्थ हो जाएगा और शरीर को नहीं लगेगा. भोजन के समय मानसिक प्रसंता जरूरी है.

जानें- आयुर्वेद के अनुसार भोजन करने की विधि, बुढ़ापा में भी रहेंगे स्वस्थ और बलवान

मनु ने कहा है कि भोजन का पूजन करके सेवन करना चाहिए. भगवान के पूजन में जैसी पवित्रता और स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है वैसा ही भोजन के प्रति रखना चाहिए. आधुनिक विज्ञान भी सिद्ध किया है कि ब्याकुल चित से खाया गया पौष्टिक भोजन हानि करता है, इसलिए भोजन के समय क्रोध, भय, निषाद, घृणा आदि विकार मन में नहीं रखना चाहिए जो कुछ भी सामने आवे उसको भगवान का प्रसाद मानकर खाना चाहिए और कभी भोजन का अनादर नहीं करना चाहिए.

भोजन करने से पहले हाथ को अच्छी तरह धोएं क्योंकि हाथ में गंदगी या रोगाणु रहने से भोजन के साथ पेट में चले जाते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं. इसलिए भोजन पर बैठने से पहले भली-भांति हाथ- पैर धोकर कुल्ली करना चाहिए. स्वयं सर्वथा स्वस्थ होकर भोज्य पदार्थों को स्वच्छ पात्रों में रखकर स्वच्छ आसन पर बैठकर भोजन करना चाहिए.

अंग्रेजी की कहावत है पेट में दांत नहीं होते- इसका मतलब है भोजन को चबाने का काम पेट के भीतर नहीं हो सकता है जो लोग मुंह से बिना भली-भांति चबाए जल्दबाजी में भोजन करते हैं उनको भोजन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है और मन्दाग्नि का रोग भी हो जाता है क्योंकि भोजन को पचाने के लिए आंतों को अधिक परिश्रम करना पड़ता है, इसलिए हर कौर को दांतों और दाढ़ों से खूब चबा- चबाकर ही निगलना चाहिए.

मुंह में भोजन को देर तक चबा लेने से दो लाभ होते हैं. एक यह कि खाया हुआ पदार्थ छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त हो जाता है दूसरा यह कि चबाने की क्रिया द्वारा मुख की ग्रंथियों में लार नामक एक विशेष रस निकालकर भोजन में मिल जाता है यह रस बहुत ही पाचक होता है और जितनी अधिक मात्रा में भोजन के साथ यह लार मिल जाता है उतना ही भोजन से होकर उसका अधिकतम सार भाग हमारे शरीर को प्राप्त होता है. साथ ही भोजन का असली स्वाद भी अधिक चबाने में आता है, चाहे जितना स्वादिष्ट भोजन हो बिना खूब चबाए निगलते जाने से कुछ भी स्वाद नहीं आता है.

महात्मा गांधी ने भी लिखा है वस्तुतः भोजन को खूब चबा- चबाकर खाना चाहिए ऐसा करने से थोड़ी खुराक में भी हम अधिक से अधिक सत्व ग्रहण कर सकेंगे.

व्यर्थ की बातें और विनोद में 2 घंटों समय बर्बाद करें और जीवन के प्रधान आधार भोजन में जल्दी करें जैसे आफत टाल रहे हो. यह महान अज्ञान है. खूब चबाकर मुंह का कौर पतला होकर आसानी से गले में उतरने लायक हो जाए और उसमें कुछ मीठा आ जाए तब ही निगलना चाहिए. पानी के सहारे कौर निगलना हानिकारक है.

भोजन से उठकर भली-भांति कुल्ली करनी चाहिए, जिससे दांत में उनके कण ना रहे, गरारा करके कंठ भी साफ करना चाहिए. कुल्ली, गरारा की प्राचीन प्रथा त्यागने से ही आजकल पायरिया आदि दंत रोग और टॉन्सिल बढ़ने की बीमारी बहुत होती है.

भोजन उपरांत तांबूल सेवन उपयोगी है. उत्तम देसी पान का एक बीड़ा खाने से मुंह शुद्ध होता है, गला साफ होता है और भोजन का पाचन भली-भांति होता है. हां याद रखें अधिक पान खाना दातों को खराब करता है.

जो लोग भोजन के तुरंत बाद लिखा- पढ़ी के काम में लग जाते हैं या दफ्तर, दुकान अथवा स्कूल को दौड़ पड़ते हैं वह अंततः निश्चय ही बीमार पड़ते हैं. शरीर का एक स्पष्ट नियम है कि जिस समय जो शरीर के अंग कार्यरत हो उस समय उसी को विशेष मात्रा में हृदय रक्त भेजता है. भोजन करने के बाद भोजन को पचाने वाले अंगों को तेजी से अपने काम पर लग जाना पड़ता है, इसलिए उनकी ओर ही रक्त का संचार बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में यदि भोजन के तुरंत बाद कोई दिमागी या परिश्रम का काम करने लगे तो हृदय विवस होकर पाचन संस्थान की ओर से रोककर अन्य काम में लगे अंगों को रक्त भेजना पड़ेगा. जिसके वजह से पाचन संस्थान को रक्त कम मिलेगा तो वह अपना काम सही तरीके से कैसे कर सकता है.

शरीर के सभी अंगों को कार्य करने की शक्ति रक्त से ही मिलती है. इसलिए भोजन के बाद लगभग आधे घंटे तक कोई भी शारीरिक या दिमागी काम नहीं करना चाहिए और विश्राम करना चाहिए. विश्राम का अर्थ सो जाना नहीं है भोजन उपरांत ही सो जाने से भी आहार का पाचन सही ढंग से नहीं होता है. भोजन के बाद कम से कम 1 घंटे तक सोना हितकर नहीं है.

यही बात परिश्रम के तुरंत बाद भोजन करने से होती है. जब तक व्यायाम या परिश्रम में थके अंगों की थकान दूर नहीं हो जाती है तब तक रक्त का संचार होता रहता है इसलिए व्यायाम या थकान से कम से कम एक घंटा बाद और भोजन के कम से कम एक घंटा बाद ही काम करना चाहिए. व्यायाम तो भोजन के 3 घंटा बाद ही करना चाहिए.

जब जी चाहे और भूख नहीं हो तब तो भोजन करना ही नहीं चाहिए. महीने में दो-तीन दिन पूरे समय या आधे समय का उपवास कर लेना चाहिए.

हम लोग सप्ताह में 1 दिन की छुट्टी मनाते हैं. जिसमें आराम करने से शरीर और मन ताजगी का अनुभव करता है. वैसे ही भोजन पचाने वाले अंगों को बीच-बीच में विश्राम देना चाहिए. महीने में दो बार एक आहार का उपवास करना चाहिए.

जिस भोजन में पूरा पोषक तत्व ना हो अथवा जो भली-भांति ना बनाने से कच्चा रह गया हो या जल गया हो, बासी हो, बदबूदार हो या अन्य प्रकार से विकृत हो गया हो ऐसा अहितकर भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए. बासी और ठंडा भोजन तो अहितकर होता ही है अधिक गर्म खाने से भी हानि होती है इसलिए भोजन को मंदोष्ण अवस्था में खाना चाहिए यानी ना तो भोजन अधिक गर्म हो और ना ही ठंडा हो ऐसा भोजन करना चाहिए. बासी भोजन तमस, अधिक उष्ण राजस और सात्विक होता है.

जिस रस की अधिक आकांक्षा हो वही भोजन मिलना चाहिए. अभिलषित शरीर के पाचक रसों के अनुकूल होता है इसलिए आहार शीघ्र पचाता है, स्वाद बस आपात भद्र अर्थात जो तत्काल अच्छा लगे परंतु जिसका परिणाम अच्छा ना हो ऐसा खाद्य पदार्थ नहीं खाना चाहिए.

नित्य नियत समय पर भोजन करने का अभ्यास जरूरी है. इससे भोजन परिपाक ठीक से होता है और निश्चित समय पर अपने आप भूख लगती है. नियत समय से पहले या देर से भोजन करने से अनेक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

एक बार किया हुआ भरपेट भोजन लगभग 6 से 8 घंटे में पच जाता है. इसलिए दो भोजन के बीच 6 से 8 घंटे का अंतर होना ही चाहिए. आयुर्वेद में भोजन कब करना चाहिए इसका एक सुंदर सूत्र निम्न शब्दों में दिया गया है.

एक बार भोजन करने के बाद 3 घंटे के अंदर कुछ भी सेवन नहीं करना चाहिए तथा 6 घंटे से ऊपर बिना भोजन नहीं रहना चाहिए. क्योंकि 3 घंटे के भीतर भोजन से रस का उद्वेग हो जाता है तथा 6 घंटे तक भोजन ना करने से शरीर बल घट जाता है. हमारे देश की जलवायु के विचार से छात्र जीवन में तीन बार, युवावस्था में दो बार और वृद्धावस्था एक बार प्रतिदिन भोजन करना चाहिए.

भोजन के लिए अपने कार्य और व्यवसाय की सुविधा से ही लोगों को समय निश्चित करना पड़ता है. फिर भी अंग्रेजों की नकल करके दिन में कई बार खाने की आदत अच्छी नहीं है असंतुलित और अनियमित भोजन के कारण ही हमारे देश में दिमागी काम करने वाले अधिकतर बीमार पड़ते हैं क्योंकि उन्हें शारीरिक श्रम करना नहीं पड़ता है फिर कई बार का खाया भोजन कैसे पचे.

आयुर्वेद में हितकर भोजन को हितासन, नियत समय के भोजन को नियतासन, उचित समय में भोजन को मितासन कहा जाता है. इसी प्रकार असात्म्य भोजन को आहितासन, असमय खाने को भी बिषमाशन और जल्दी-जल्दी दो-तीन घंटा से खाने को अध्यशन कहते हैं. भोजन में इन सब का ध्यान रखना चाहिए. इससे हमारा शरीर स्वस्थ और बलवान बना रहता है.

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स्रोत- आरोग्य प्रकाश.

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