शुक्रवार को सुबह होते ही करें ये उपाय, हो जाएंगे मालामाल

ज्योतिष शास्त्र- हर किसी की चाहत होती है कि वह स्वस्थ होने के साथ ही हर तरह से सुखी संपन्न हो. उसके यहां किसी चीज की कमी ना हो और इन सभी चीजों की पूर्ति के लिए धन की आवश्यकता होती है. हालाकि धन कमाने के लिए लोग दिन-रात मेहनत करते हैं. लेकिन धन एक तरफ से आता है और दूसरी तरफ चल जाता है. ऐसे में धनवान बनना या मालामाल होना मुश्किल हो जाता है. लेकिन शास्त्रों में कुछ उपाय बताए गए हैं जिसे करने से काफी लाभ होता है.

शुक्रवार को सुबह होते ही करें ये उपाय, हो जाएंगे मालामाल

जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि शुक्रवार का दिन धन की देवी महालक्ष्मी का दिन होता है. इसलिए शुक्रवार के दिन कुछ आसान उपायों को करके आप मां लक्ष्मी को प्रसन्न कर सकते हैं और जब मां लक्ष्मी प्रसन्न हो जाएगी तो धन की कमी कभी नहीं होगी.

करें उपाय-

महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार की शाम को गाय के घी का दीपक जलाकर पूजा करें. पूजा करने के लिए घर का इशान कोण चुने. दीपक में रुई की जगह लाल रंग के सूती कपड़े का इस्तेमाल करें. साथ ही दीपक में थोड़े से केसर के धागे भी डाल दें. ऐसा करने से घर में सकारात्मक तक फैलती है. घर का वातावरण खुशनुमा शांतिमय और ऊर्जावान बना रहता है.

करें कन्या पूजन-

बिजनेस या नौकरी में उन्नति पाने के लिए शुक्रवार की शाम को नहा धोकर साफ कपड़े पहनें. उसके बाद अच्छा सा भोजन और मिठाई में सफेद चीज बनाएं. फिर 7 कुंवारी कन्याओं को आदर सहित घर बुलाकर उनका पूजन करें और भोजन कराएं. साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा भी भेंट करें. जरूरतमंद कन्याओं को भोजन करवाने से मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न होती है. अगर संभव हो सके तो मिठाई में केसर वाली खीर बनवाए. इससे आपकी तरक्की में आने वाली बाधाएं दूर हो जाएगी.

शंख-

शंख भगवान विष्णु जी के पांच चिन्हों में से एक है. इसलिए मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार के दिन एक दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल भरकर भगवान विष्णु जी का अभिषेक करें. उसके बाद विधि अनुसार उनकी पूजा करें. साथ ही देवी लक्ष्मी जी का पाठ करें. ऐसा करने से घर की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा. धन का आगमन होने से घर परिवार के लोगों का व्यवहार खुशनुमा बना रहेगा.

सुबह जलाएं घी का दीपक-

अगर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं और धन की चाहत रखते हैं तो सुबह उठकर नहा- धोकर मां लक्ष्मी की मूर्ति या फोटो के सामने घी का दीपक जलाकर श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें. यह काम सिर्फ शुक्रवार को ही नहीं बल्कि प्रतिदिन करें तो अधिक फलदाई होगा.

श्री लक्ष्मी चालीसा
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥1॥

तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥2॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥3॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥4॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥5॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥6॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥7॥

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥8॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥9॥

ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥10॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥11॥

पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥12॥

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥13॥

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥14॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥15॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥16॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥17॥

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥18॥

रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥19॥

॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

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