जानें- अरुचि होने के कारण, लक्षण एवं जड़ से ख़त्म करने के आयुर्वेदिक उपाय

 कल्याण आयुर्वेद- अरुचि, खाना खाने की इच्छा ना होना, अरोचक, आधुनिक विज्ञान में इसे लॉस आफ ऐपेटाइट कहते हैं.

जानें- अरुचि होने के कारण, लक्षण एवं जड़ से ख़त्म करने के आयुर्वेदिक उपाय

भोजन में अनिच्छा को एनोरेक्सिया कहते हैं. इसमें प्रधान विकृति आमाशय, अग्नाशय अथवा यकृत में होती है. प्रधान रूप से यह किसी शारीरिक विकृति का एक लक्षण मात्र है. इस रोग में थोड़ा भी भोजन करने की इच्छा नहीं होती है. अगर जबरजस्ती भोजन करने बैठ जाएं तो 1-2-4 कौर से अधिक नहीं खा पाते हैं. उसका पेट गैस से भरा रहने के कारण बिना कुछ खाए ही भारी रहता है.

अरुचि होने के कारण-

सामान्य रूप से अरुचि निम्न रोगों अथवा अवस्थाओं में होती है.

हाइड्रोक्लोरिक एसिड की कमी-

तीव्र तथा क्रॉनिक अमाशय सूजन आदि रोगों में जब अमाशय की ग्रंथियां हाइड्रोक्लोरिक एसिड का कम मात्रा में निर्माण करती है तब अरुचि हो जाती है.

मानसिक कारण-

चिंता, भय, क्रोध, घबराहट, हिस्टीरिया, अनिद्रा तथा अन्य मानसिक स्थितियों में भूख लगना बंद हो जाती है.

संक्रामक  रोग-

किसी भी संक्रमण की प्रारंभिक अवस्था में रोगी को प्रायः अरुचि हो जाती है.

चिरकारी रोग-

यक्ष्मा आदि चिरकारी रोगों में मुख्य ताजा भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है.

चयापचय क्रिया में मंदता-

एडिशंस तथा मिक्सीडीमा आदि ऐसे रोग हैं. जिनमें शरीर में संपादित होने वाली चयापचय क्रिया बहुत मंद हो जाती है परिणाम स्वरूप रोगी को अरुचि हो जाती है.

शरीर में विटामिंस की कमी-

आज के युग में विटामिन की कमी भी अरुचि का एक प्रधान कारण माना जा रहा है. विशेष रूप से शरीर में विटामिन बी कंपलेक्स की कमी हो जाती है तो भूख खत्म हो जाती है.

शरीर क्रियात्मक कारण-

अत्यधिक पौष्टिक आहार लेने तथा पूरे दिन कार्य न करने आदि के कारण भी अरुचि हो जाती है.

कृमि रोग-
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शरीर में आंतरिक कृमियों की उपस्थिति में भी अरूचि एक प्रधान कारण है.

कोष्टबद्धता-
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अमाशय का अधिक मात्रा में संचय से होने पर तथा मलावरूद के कारण भी भोजन की प्रति अरुचि होती है.

आमाशय व्रण-
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आमाशय और आंत के अनेक रोगों तथा कैंसर के कारण रोगी को भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है. ऐसा प्रायः अमाशय और लीवर की खराबी से होता है.

अन्य कारण-

संक्रामक ज्वर, ट्यूबरकुलोसिस तथा मेलीग्रैंट डिजीज इसके लिए विशेष उत्तरदाई है. गैस्ट्रिक अल्सर की प्रारंभिक अवस्था इसका कारण हो सकता है. अल्सर में कभी-कभी भोजन लेने के प्रति भय सा प्रतीत होता है.

रोगों के कारणों की महत्ता-

अरुचि के अधिकांश रोगी मानसिक विषमयता से ग्रसित रहते हैं. अरुचि में शारीरिक कारणों की अपेक्षा मानसिक कारणों का विशेष महत्व माना जाता है.

अरुचि के लक्षण-

इस रोग में रोगी को खाना खाने की इच्छा नहीं होती है. यदि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध या सबके कहने पर खाने के लिए राजी भी हो जाता है तो दो-चार कौर से ज्यादा नहीं खा पाता है.

थोड़ा सा खाने के बाद ही उसे ऐसा लगता है कि उसका पेट भर गया तबीयत भारी हो जाती है.

रोगी को खट्टी अथवा सुखी डकारे आती है.

बिना खाए पिए ही उसका दिल भरा सा मालूम होता है.

रोगी का पेट भारी मालूम पड़ता है और मुंह में कभी-कभी पानी भर आता है.

किसी कार्य में उसका मन नहीं लगता है. वह सदैव मर्लिन मुख रहता है. भोजन के बाद भी उसका चेहरा खुश नजर नहीं आता है.

रोगी थोड़ी सी मेहनत करने पर ही थक जाता है.

रोग के लंबे समय तक बने रहने से उसके शरीर में काफी कमी आ जाती है और वह एनीमिक हो जाता है.

अनेक बार यकृत दोष एवं दूषित पीत के संचय के कारण स्वाद की कटुता तथा अरुचि भी उत्पन्न हो जाती है.

अरुचि दूर करने के आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय-

1 .रोगी को चिंता, शोक आदि कारणों से बचना चाहिए.

2 .जिस कारण से अरुचि की समस्या हुई है सबसे पहले उस कारण को दूर करना चाहिए.

3 .रोगी का मन सदैव खुश रखें तथा उसे अकेला कभी न छोड़े.

4 .शरीर में रक्त की कमी की स्थिति में रक्तवर्धक दीपन पाचन औषधियां लीवर एक्सट्रैक्ट आदि का प्रयोग करना चाहिए.

5 .कृमि की स्थिति में कृमि नाशक दवाइयां देना चाहिए.विडंग का चूर्ण देना हितकर होता है.

6 .अजीर्ण तथा अमाशय शोथ की उचित चिकित्सा करें. तत्पश्चात विटामिन सी, विटामिन बी कंपलेक्स आदि द्वारा एनोरेक्सिया का शमन करें.

7 .आमांश एवं मल के शोधन के लिए कैस्टर आयल आदि का प्रयोग आवश्यक है.

8 .सप्ताह में 1 दिन उपवास रखने से क्षुधा में वृद्धि हो कर अरुचि का विकार नष्ट होता है.

9 .रोगी को खाने से पहले टहलने का सलाह दें. प्रातः और शाम खुली हवा में टहलने को कहें.

10 .रोग की पुरानी स्थिति होने पर शरीर पर तेल की मालिश करें.

11 .अगर मसूड़ों और दांतों से खून निकलने के कारण अरुचि की समस्या हुई है तो इसे दूर करने का उपाय करें.

12 .प्रथम 2 दिन चावल और मूंग की दाल की खिचड़ी खिलाकर 4 तोलासोठ, 4 तोला सौफ, 4 तोला सनाय की पत्ती, 4 तोला सेंधा नमक, 4 तोला बड़ी हरड़ को क्वाथ बनाकर सुबह- शाम पिलाकर विरेचन करावे.

13 .4gram एलुवा, 2 ग्राम उषारे रेवन, 1 ग्राम भुनी हुई हींग, 6 ग्राम खील सुहागा सबको महीन पीसकर अमलतास के रस से मटर के बराबर गोली बना लें. अब इस गोली को 1-2 की मात्रा में शीतल जल के साथ सेवन कराएं. इससे मल को फुलाकर उदर विकार शांत करती है.

14 .थूहर के दूध में चावल को भिगोकर फूल जाने पर पीसकर पुआ बनाकर 7 दिन खिलाने से उदर के विकार, अजीर्ण, गुल्म, प्लीहा, जलोदर, अरुचि दूर होती है.

15 .बिड़नमक, अजवाइन, दोनों जीरे, हरे, चित्रक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, अमलबेत, अजमोद, धनिया, सबको बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें. अब इस चूर्ण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में जल के साथ सेवन करने से उदर विकार, अग्निमांध तथा अरुचि दूर होती है.

16 .लवण भास्कर चूर्ण 3 से 6 ग्राम की मात्रा में पानी या छाछ के साथ सेवन करने से अरुचि से राहत मिलती है.

17 .जवाखार, सज्जीखार, खील सुहागा, पीपल, पीपरामूल, चब्य, चित्रक, सोठ सबको बराबर मात्रा में लेकर सब के बराबर भुनी हुई भांग. भांग से आधी सहजन की जड़ की छाल को पीसकर पाउडर बना लें. अब इनको एक दिन भांग के रस में खरल करें. इसके बाद एक दिन सहजन के रस में खरल करें. एक दिन चित्रक के रस में खरल करके सुखा कर हाड़ी में भरकर मुख्य मुद्रा कर गजपुट में फेंक दें. इसके बाद इसे निकाल कर अदरक के रस से 7 दिन घुटाई कर दो दो रत्ती के बराबर गोली बना लें. अब इस गोली को एक से दो की मात्रा में गुड़ के साथ या मधु के साथ सेवन करें. इसके नियमित सेवन करने से अजीर्ण, अतिसार, संग्रहणी, अग्निमांद्य अरुचि आदि दूर हो जाती है.

18 .घी गवार आधा शेर, अदरक का रस आधा शेर, नींबू का रस आधा शेर, पांचों नमक पावभर, जवाखार एक छटाक सबको मिट्टी के पात्र में भरकर मुख्य मुद्रा कर 1 महिना धूप में रख दे. 1 माह बाद इसे छानकर शीशी में रख लें. अब 6 ग्राम से 12 ग्राम दिन में दो बार पीने से अरुचि, अग्निमांद्य, गुल्म, यकृत, प्लीहा, जौंडिस, बवासीर आदि उदर रोगों को नष्ट करता है.

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