गीता ज्ञान- सदैव दुखी, परेशान और व्याकुल रहते हैं तो एक बार जरूर पढ़ें यह खबर

धर्मशास्त्र- श्री कृष्ण महाराज गीता द्वारा कह रहे हैं जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित होगी, कोई इसे रोक नहीं सकता है. श्रीमद् भागवत कथा में वर्णन मिलता है कि एक समय पांडवों को वन में विचरण करते समय बहुत जोरों की प्यास लगी तो एक भाई पानी की तलाश में सरोवर के पास जाता है और चारों भाई विश्राम करने रुक जाते हैं. जैसे ही पानी लेने जाता है तभी आवाज आती है रुक जाओ, पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर सही-सही दो वरना यही मूर्छित हो जाओगे. तुम सही उत्तर देने पर ही पानी ले सकते हो. प्रश्न है- इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? चुकि उत्तर सही नहीं दिया इसलिए वह भाई वही मूर्छित हो गया. इस प्रकार से भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव सभी एक-एक करके पानी लेने आते हैं और सभी वहीं मूर्छित हो जाते हैं.

गीता ज्ञान- सदैव दुखी, परेशान और व्याकुल रहते हैं तो एक बार जरूर पढ़ें यह खबर

अब युधिष्ठिर को चिंता सताने लगी कि एक भी भाई जो पानी लेने गया वापस नहीं लौटा. आखिर बात क्या है? तब युधिष्ठिर वहां पहुंचते हैं और देखते हैं कि उनके चारों भाई मूर्छित पड़े हैं. सोचा शायद यहां पहुंचते-पहुंचते काफी थक गए होंगे और तीव्र प्यास के कारण बेहोश होकर गिर गए होंगे. जैसे ही युधिष्ठिर पानी लेने आगे बढ़ते हैं वैसे ही फिर वही आवाज आती है. रुक जाओ मैं यक्ष हूं और पहले मेरे प्रश्न का सही उत्तर दो वरना तुम्हारी गति भी इन्हीं भाइयों की तरह होगी.

युधिष्ठिर को आश्चर्य होता है कि मेरे भाइयों की यह दशा करने वाला यक्ष भला क्या पूछना चाह रहा है? जब युधिष्ठिर महाराज ने कहा आपका प्रश्न क्या है?

तब यक्ष में वही प्रश्न युधिष्ठिर से पूछा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया प्रतिदिन प्राणी मृत्यु का ग्रास बनकर यमलोक की ओर जा रहा है. यह देख कर भी धरती पर शेष बचे लोगों की बड़ी कामना रहती है कि वे सदा जीवित रहे.

दूसरे शब्दों में कोई मरना नहीं चाहता है किसी की मृत्यु पर या कुछ देर श्मशान में आने पर लोग जरूर सोचते हैं कि फलाना की मृत्यु हो गई और एक दिन हमें भी मरना है. लेकिन फिर थोड़ी ही देर में भूल जाते हैं कि हमारी मृत्यु भी होगी. कुछ ही लोग यह हमेशा याद रखते हैं और इसलिए उन्हें मोह, माया, लालच, वगैरह कम परेशान करती है.

अच्छा हम मरना क्यों नहीं चाहते हैं? क्योंकि हमें अनुभव नहीं है कि हम सभी शाश्वत, अविनाशी, ईश्वर की संतान है. हमारा पिता अजर- अमर है. हमारा चिंतन सदा इस नाशवान शरीर के प्रति होता है. इसलिए इस दिन की समाप्ति पर दुख होता है.

भगवान श्री कृष्ण ने आत्मा की अमरता और अजर होने का उपदेश दिया था. प्रत्येक जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को प्राप्त करता है. जब वस्त्र गंदे हो जाते हैं तो उन्हें उतार कर अलग कर देते हैं और नए वस्त्र धारण कर लेते हैं. ठीक इसी प्रकार शरीर जीर्ण- शीर्ण हो जाने पर आत्मा शरीर को त्याग देती है. यह सिद्धांत जब तक हम दृढ़ता पूर्वक स्वीकार नहीं करेंगे तब तक मृत्यु की हकीकत से दूर भागते रहेंगे.

श्री कृष्ण ने अर्जुन को मृत्यु का वास्तविक स्वरूप समझाया और कहा कि तुम आत्मा हो, शरीर नहीं. अर्जुन को मृत्यु बोध होने पर ज्ञान, वैराग्य, भक्ति एवं युद्ध लड़ने का साहस जागृत होता है. मृत्यु तो निश्चित है जिन्होंने यह आत्मबोध प्राप्त कर लिया वही आनंद से जीते हैं जो अज्ञानी इस सच्चाई से दूर चौबीसों घंटे संसार की भूल भुलैया में भटक रहे हैं वे सदैव दुखी परेशान व व्याकुल रहते हैं.

इसलिए यह निर्णय हमें खुद लेना होगा. इस शरीर में उपस्थित रहने वाली आत्मा किसी काल में ना तो जन्म लेती है और ना ही मरती है. यह आत्मा अजन्मी, नित्य सास्वत, अजर- अमर और सनातन है. शरीर का नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता, इस रहस्य को किसी तत्वदर्शी संत महापुरुष सद्गुरु के सानिध्य में बैठकर जो जन जान लेते हैं वास्तव में वे मृत्युंजय कहलाते हैं.

क्योंकि उन्होंने अपनी आत्मा को पहचान कर मृत्यु को जीत लिया है. शरीर और आत्मा का भेद जान लेना ही असली मोक्ष है और यह मोक्ष हमें जीते जी प्राप्त करना है. मृत्यु के बाद मोक्ष की कल्पना बेमानी है निरर्थक है.

कहा गया है हंसा निकल गया पिंजरे से खाली पड़ी रही तस्वीर अर्थात आत्मा रूपी हंस जब पिंजरे रूपी शरीर से निकल जाता है तो इस नश्वर देह की मृत्यु हो जाती है. समय रहते यदि हमने आत्मा रूपी हंस को पहचान लिया, इसका अनुभव कर लिया तो जीवन धन्य हो जाएगा. इसलिए समय व्यर्थ न गवांकर आत्म ज्ञान को प्राप्त करना ही सबसे उत्तम है.

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