शरीर के इन 14 वेगों को रोकना पड़ सकता है भारी, हो जाएंगे बीमार

कल्याण आयुर्वेद- वैसे तो हमारे शरीर के बहुत सारे वेग होते हैं. जैसे कि पेशाब, मलवेग, भूख लगना, प्यास लगना इत्यादि. लेकिन कुछ वेग ऐसे भी होते हैं जिन्हें भूलकर भी नहीं रोकना चाहिए, क्योंकि इस वेग को रोकने से हमारे शरीर में कई तरह की बीमारियां होने की संभावना अधिक हो जाती है. आज हम वैसे 14 वेगों के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे भूल कर भी नहीं रोकना चाहिए.

शरीर के इन 14 वेगों को रोकना पड़ सकता है भारी, हो जाएंगे बीमार

1 .भूख का वेग- भूख का वेग रोकने से शरीर दुर्बल होने लगता है और शरीर में खून की कमी हो जाती है. जिसके वजह से व्यक्ति को चक्कर और मूर्छा जैसी समस्याएं होने लगती है.

2 .प्यास का वेग- प्यास लगने पर पानी ना पीने से थकावट, हृदय से पीड़ा, मुंह और गले का सूखना, चक्कर आना, शरीर में पानी की कमी होना जैसे कष्ट हो सकते हैं.

3 .आंसू का वेग- दुख पड़ने पर आंसू और रुदन के वेग को रोकने से जुकाम, सिर भारीपन, अनिद्रा, गहन उदासी, नेत्र रोग और ह्रदय के रोग होने की संभावना अधिक हो जाती है.

4 .नींद का वेग- नींद का वेग रोकने से आंखों में जलन, सिर में भारीपन, सिर दर्द, पेट से जुड़ी समस्या अपच रोग हो जाते हैं.

5 .सांस का वेग- व्यायाम अथवा परिश्रम करने पर सांस का वेग बढ़ जाता है ताकि शरीर की बढ़ती हुई ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति हो सके, इस वेग को रोकने से घबराहट, ह्रदय की पीड़ा तथा मूर्छा रोगों में से किसी एक के होने की संभावना अधिक हो जाती है.

6 .खांसी का वेग- खांसी आने पर उसे अंदर ही अंदर रोकने से दमा, सीने में दर्द तथा गले से संबंधित अन्य रोग होने की संभावना रहती है. यही नहीं खांसी को रोकने से प्रचंड रूप धारण कर सकती है.

7 .छींक का वेग- इस वेग को रोकने से आधा सिर का दर्द, सिर में भारीपन, चेहरे का लकवा आदि रोग हो सकते हैं.

8 .पेशाब का वेग- पेशाब का वेग अनुभव होने पर उसे काफी समय तक रोकने से पेशाब में रुकावट, मूत्राशय और लिंग में जलन, दर्द होना, पेट के निचले हिस्से में दर्द व सूजन की समस्या हो सकती है.

9 .मल का वेग- अपान वायु यानी पाद का रुक जाना पक्वाशय और सिर में दर्द, कब्ज, पिंडलियों में ऐठन आदि रोग शौच के वेग को रोकने के परिणाम स्वरूप हो सकते हैं.

10 .अपान वायु का वेग- पाद आने को अपान वायु का वेग कहते हैं. इसे रोकने से वात यानि वायु संबंधी रोग पेट दर्द, पेट फूलना, मूत्र तथा मल बाहर निकलने से रुकावट के कष्ट हो जाते हैं.

11 .वीर्य का वेग- कामोत्तेजना की चरम सीमा पर वीर्य अपने स्थान को छोड़ देता है तो उसे रोकने से अनेक प्रकार के रोग हो सकते हैं. आयुर्वेद के मुताबिक इन रोगों में पुरुष ग्रंथि, अंडकोष, शुक्र प्रणाली और शुक्राशय में सूजन, गुदा में पीड़ा, पेशाब में रुकावट आदि शामिल है.

12 .उल्टी का वेग- इसे रोकने पर बाद सूजन, जी मिचलाना, व भोजन से अरुचि आदि रोग हो जाते हैं.

13 .जम्हाई का वेग- इस वेग को रोकने से शारीरिक अंगों में सिकुड़न, हाथ- पैरों में कंपन या शरीर में भारीपन होने के लक्षण प्रकट होते हैं.

14 .डकार का वेग- डकार जाने की अनुभूति होते ही उसे रोकने पर हिचकी, छाती में जकड़न, सांस से कष्ट और भोजन में अरुचि हो जाती है.

उपर्युक्त सभी शारीरिक वेग इतने तीव्र होते हैं कि उन्हें रोकना काफी मुश्किल होता है. इन वेगों की क्रियाएं हमारे शरीर की स्वाभाविक रूप से स्वस्थ होने वाली आंतरिक प्रणाली से जुड़ी होती है. इनका संबंध हमारे अवचेतन से होता है. फिर भी मनुष्य सभ्यता और क्षमता के अप्राकृतिक सामाजिक नियमों अथवा अन्य कारणों से इन वेगों को रोकने का प्रयत्न करता है, जिसका प्रभाव हमारे शरीर में अन्य रोगों के रूप में प्रगट होने लगता है. अतः इन प्राकृतिक गुणों को जहां संभव हो कभी नहीं रोकना चाहिए.

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