त्रिखल ( तेतर ) दोष क्या है ? जानें क्यों निवारण करना है जरूरी

ज्योतिष शास्त्र- वैदिक शास्त्र कई प्रकार के योग और दोष का वर्णन किया गया है. योग वह होते हैं जो जातक के जीवन में सुख प्रभाव लाते हैं और दोष उसे कहा जाता है जो जातक के जीवन में समस्याएं और कष्ट लाते हैं. एक ऐसा ही दोष है त्रिखल दोष. यह दोष मुख्यतः दो प्रकार का होता है. जिनमें से एक दोष की चर्चा आम तौर पर ज्यादा की जाती है जब किसी घर में तीन पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म होता है या तीन पुत्रों के बाद पुत्री का जन्म हो तो इसे त्रिखल कहा जाता है. यह दोष शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देते हैं.

त्रिखल ( तेतर ) दोष क्या है ? जानें क्यों निवारण करना है जरूरी

तीन पुत्र के बाद पुत्री के जन्म का फल-

यदि किसी के घर में 3 पुत्र के बाद पुत्री का जन्म हुआ हो तो यह शुभ संकेत माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जिस दिन से कन्या का जन्म होता है उसी दिन से घर में बरकत शुरू हो जाती है. यदि घर के मुखिया के पास आजीविका का कोई साधन ना हो, उसके पास कोई नौकरी या व्यापार नहीं हो तो तीन पुत्रों के बाद पुत्री का जन्म होने से उसे आय के साधन प्राप्त होना शुरू हो जाते हैं. व्यापार में बढ़ोतरी शुरू हो जाती है, लेकिन इस प्रकार की पुत्री का जन्म उसकी माता के लिए शुभ नहीं होता है. पुत्री के जन्म के बाद से माता शारीरिक रोगों से पीड़ित हो जाती है, उसे बार-बार बीमारियां घेर लेती है और इन बीमारियों से कभी छुटकारा नहीं मिलता है. एक बीमारी दूर होती दूसरी बीमारी हावी होने लगती है.

तीन पुत्रियों के बाद पुत्र के जन्म का फल-

तीन पुत्रियों के जन्म के बाद यदि पुत्र का जन्म होता है तो यह उस बच्चे के पिता और परिवार के लिए शुभ नहीं माना जाता है. पुत्र के जन्म के बाद से घर में लगातार कोई न कोई परेशानी आने लगती है और आर्थिक स्थिति खराब होने लगती है. व्यापार-व्यवसाय लगातार गिरने लगता है. कोई भी काम पूरा नहीं होता है. कार्यों में रुकावट आती है. ऐसे पुत्र के जन्म से पिता तथा नाना के पक्ष को भय, रोग एवं धन हानि होती है. पिता को लगातार मानसिक तनाव बना रहता है. विवादित स्थितियां बनती रहती है, इस दोष में जन्म से पुत्र को भी जीवन में कई बार मृत्यु तुल्य कष्ट का सामना करना पड़ता है.

एक अन्य प्रकार का त्रिखल दोष-

ऊपर बताए गए दोनों स्थितियों के अलावा एक अन्य प्रकार का त्रिखल भी होता है. इसके अनुसार किसी जातक की जन्मकुंडली में त्रिखल दोष तब बनता है. जब एक ही ग्रह तीन अलग-अलग स्थितियों में मौजूद होता है. उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म समय में सूर्य, कृतिका, उत्तराषाढ़ा या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में हो तथा जन्म कुंडली में सूर्य पहले या दसवें भाव में स्थित हो तो त्रिखल दोष का निर्माण होता है क्योंकि इन नक्षत्रों का स्वामी सूर्य है प्रथम और दशम भाव का कारक ग्रह भी सूर्य है. इस प्रकार की स्थिति हो तो भी त्रिखल दोष होता है.

त्रिखल दोष निवारण के उपाय-

जब त्रिखल दोष हो तो इसका निवारण करवाना बहुत जरूरी है, इसके लिए बालक या बालिका के जन्म के ग्यारहवें दिन विशेष पूजा करवाई जाती है. जिससे घर में सुख- शांति बनी रहती है. आमतौर पर जन्म के दसवें दिन तक सूतक माना जाता है. यह पूजा सूतक समाप्ति के बाद 11वें दिन करवाई जाती है. इसके लिए शुभ मुहूर्त में पति-पत्नी शुद्ध आसन पर पूरब की ओर मुख करके बैठ जाएं. संकल्प पूर्वक गणपति पूजन, नवग्रह पूजन आदि करें. उसके बाद कलश स्थापना करते हुए उसके ऊपर ताम्रपत्र रखकर उस पर श्री हरि की स्वर्ण या तांबे की मूर्ति स्थापित करके पूजा की जाती है.

विधि पूर्वक त्रिखल दोष शांति कर्म की कर्मकांडी पंडित से करवाएं. त्रिखल पूजा के बाद दान में तीन प्रकार के अन्न, तीन वस्त्र, तीन धातु सोना-चांदी और तांबा तथा साथ में गुड़ एक लाल पर्ण, नारियल और दक्षिणा सहित संकल्प पूर्वक पुत्र/ पुत्री और उसकी माता का हाथ लगवा कर मंदिर में या कुल ब्राम्हण को दान करना चाहिए. यदि त्रिखल दोष के बारे में जानकारी ना हो और बाद में पता लगे तो इससे कोई डरने या घबराने की बात नहीं है. कभी भी इसकी शांति करवाई जा सकती है?

नोट- यह पोस्ट शैक्षनिक उद्देश्य से लिखा गया है, अधिक जानकारी के लिए योग्य ज्योतिषाचार्य की सलाह लें. धन्यवाद.



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