जानें- शरीर से गन्दगी निकलने के रास्ते कौन- कौन हैं?

मूत्र-त्याग-

पीया हुआ शरीर पानी, के शरीर भीतरी के अंगों भीतरी की अंगों सफाई को का धोकर दूसरा तथा साधन उनके मूत्र मल-त्याग और है विषों को बटोर कर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देता है। मूत्र का सम्बन्ध गुर्दो से होता है। मूत्र जब गुर्दो में पहुँचकर छनता है, तब वह उसका सारहीन पदार्थ और मैल अलग निकालता है। मैल और शरीर के जलीय अंश का योग ही मूत्र होता है। खाये-पीये पदार्थों का आवश्यक तरल अंश गुर्दो द्वारा छनकर वस्ति में एकत्र होता है और समय-समय पर मूत्र-मार्ग द्वारा बाहर निकलता है | उचित मात्रा में पेशाब होते रहने से शरीर का जहर और रक्त के विजातीय तत्त्व बाहर निकलते हैं।

जानें- शरीर से गन्दगी निकलने के रास्ते कौन- कौन हैं?

चौबीस घण्टों में लगभग डेढ़ सेर पेशाब उतरना चाहिए। इससे अधिक और बार-बार थोड़ी-थोड़ी देर में भी पेशाब उतरना हानिकर एवं रोग का लक्षण है। इसी प्रकार बहुत कम पेशाब होना भी उचित नहीं। स्वस्थ अवस्था में पेशाब का रंग हल्के पीले रंग का होता है। यह जब हल्दी जैसा पीला, लाल या मटमैला हो, तो विकार समझना चाहिए।

पेशाब कम होता हो, और उसका रंग अस्वाभाविक हो तो अधिक मात्रा में पानी पीने से पेशाब साफ और उचित परिमाण में होने लगता है। प्रतिदिन लगभग ढाई किलों पानी पीने से उचित पेशाब उतरकर गुर्दो और वस्ति की
नियमित सफाई होती रहती है।
पसीना-
भीतर सफाई की तीसरा प्राकृतिक साधन पसीना है। रक्त सारे शरीर में घूमकर जो मैल एवं विषैले पदार्थ इकट्ठा करता है, उसको बाहर निकलने का दोहरा प्रबंध है। एक तो गुर्दो में छनकर रक्त का मैल पेशाब द्वारा बाहर निकलता है, दूसरा पसीना द्वारा। सम्पूर्ण शरीर में बहुत छोटे-छोटे छिद्र बने हैं जिनमें रोये कहे जानेवाले महीन बाल उगे हैं। इन छोटे छिद्रों से सदा नियमित अभ्यास होना चाहिए। वह अभ्यास उपासना क्रम के साथ सुगमता
से प्राप्त हो सकता है। उपासना मनमाने ढंग से यथार्थ फलवाली नहीं हो सकती। उसके लिए नियमित समय, नियमित स्थान, नियमित साधन-विधि, नियमित भोजन आदि को अपनाना बाँछनीय होता है। हिन्दू, मूस्लिम, ईसाई सभी धर्मवाले इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि कोई एक उत्कृष्ट शक्ति अवश्य है; जो संसार के अणु-अणु में व्याप्त है, जो हमें गति देती है, हमारे प्रत्येक कर्म को देखती है और हमारे कर्म का यथोचित फल हमें देती है। वही परमशक्ति परमात्मा, जिसकी कृपा के बिना हमारा जीवन आनन्दमय नहीं हो सकता है। यह मान्यता, ही अध्यात्म है। मन को निर्मल और सशक्त बनाने के लिये इसी अध्यात्म भावना के साथ आस्तिकतापूर्वक परमात्मा के जिस स्वरूप को भी आप मानते हैं, उसकी नियमित उपासना अवश्य करें। उससे मन के सम्पूर्ण विकार दूर
होंगे। मानसिक स्वच्छता का उससे उत्तम दूसरा कोई साधन नहीं है।
शारीरिक स्वच्छता-
शरीरांगों की सफाई को ही आधुनिक विज्ञान में व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) कहा जाता है। इस प्रसंग को भी हमें दो भागों में बांटना चाहिए। एक भीतरी सफाई, दूसरी बाहरी सफाई।
शरीर की भीतरी सफाई-
मनुष्य-शरीर के भीतर अवयवों की स्वच्छता ही भीतरी सफाई है। यह मानव-शरीर एक इंजन के समान है। कोयले और पानी से इंजन को शक्ति प्राप्त होती है, किन्तु उसमें सारहीन पदार्थ-राख को नियमित रूप से बाहर निकालना पड़ता है। यदि उस सारहीन पदार्थ को इंजन में ही पड़ा रहने दें तो इंजन बहुत जल्द खराब हो जायगा। इसी प्रकार मनुष्य जो अन्न-पानी खाता-पीता है, उसका सार-तत्त्व खून बनकर शरीर के विभिन्न अवयवों में पहुँच जाता और निःसार पदार्थ पेट में पड़ा रह जाता है। शरीर के भीतर से निःसार मल पदार्थ को मल-मूत्र-पसीना आदि के रूप में बाहर निकालना आवश्यक होता है। यदि इन सारहीन पदार्थों को बाहर न निकाला जाय, तो शरीर रूपी इंजन खराब हो जायगा और कुछ दिनों के भीतर जीवन-गाड़ी का चलना रूक जाएगा। शरीर की स्वचालित मशीन अपना हर काम नियमित ढंग से स्वयं करती है। यदि उसकी गति में बाधा न पड़े, तो वह अपनी सफाई अपने
व्यस्त आप कर समय देती की है सुविधा। परन्तु के आजकल अधीन ही हर शरीर मनुष्य को चलाना को अपने पड़ता कार्य है, उद्योग यही कारण और है मनुष्यों कि भीतरी के विभिन्न सफाई समय से सम्बन्धित और प्रकार शारीरिक चल पड़े क्रियाओं हैं। के अतएव विषय इनकी में भिन्न जानकारी-भिन्न बहुत महत्त्वपूर्ण है।

नियमित हमारी आप करती अनियमितताओं काम शरीर ही विधिवत् की है, मशीन इसलिए नहीं के अपने कारण कर हमें पाती या भीतरी क्या, रोगी करना जब अंग-होने कि प्रत्यंगों? पर हम ऐसा की शरीर शरीर सफाई सोचना की को उसकी का मशीन उचित काम निश्चित अपना नहीं अपने।
सफाई आँतें न अवस्था चलाते रखने (मलाशय से हैं हमारी, से और लिए तो शरीर) नियमित, हमारा चेष्टा हम गुर्दे को उचित और से यह गति भयंकर जिन फेफड़े उपक्रम भी से भीतरी कर्त्तव्य हानि नहीं मुख्य करके शरीरांगों और चलने हो हैं उसकी रोग जाता। देते इन की, का है सहायता सफाई अंगों और होना कि की अपनी हो निश्चित उसकी करें सफाई सकती सुविधा। भीतरी है का है।,-से बाहरी ध्यान उनमें ही
मल-त्याग-
छोटी आंत हम में जो और कुछ उसके खाते-बाद पीते बड़ी हैं, वह आँत पहले (पक्वाशय आमाशय) में में। वहाँ पहुँचता तक है, पहुँचने फिर सारहीन के पूर्व ही पदार्थ भोजन ही पहुँचता का सारभाग है। उस प्रचूषित सारहीन हो चुकता पदार्थ है में। मल बड़ी और आंत विषैले में केवल तत्त्व होते हैं, जिनके नित्य-नियमित शरीर के बाहर निकलने से आँतों की सफाई होती है।
शौच क्रिया (पाखाना जाना) आँतों की सफाई के लिए सबसे सहज और प्राकृतिक तरीका है। इसलिए बचपन से ही नियमित रूप से नियमित समय पर पाखाना जाने की आदत डालनी चाहिए। दिन-रात में कम-से-कम दो बार पाखाना अवश्य जाना चाहिए। यदि तीन बार भी जाया जावे तो कोई हानि नहीं। मल का रोकना और दो-दो
दिन तक पाखाना न जाने की आदत बहुत ही हानिकारक है। मल यदि चौबीस घण्टे से अधिक आँतों में रह जावे तो उसके सड़ने से जो विषैले द्रव्य और गैस आदि उत्पन्न होते हैं, वह रक्त में मिलकर अनेक भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं। शौच का समय नियमित होना चाहिए। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी शाम और कभी रात को शौच जाना — ऐसी प्रवृति हानिकारक है। किसी कारण नियम समय पर पाखाना न उतरता हो, तो भी शौच जाना चाहिए। कुछ दिन नियमित समय से पाखाना जाते रहने से उसी समय शौच होने लगता है। ऐसा कुछ दिन करने से अभ्यास हो जायगा और नियत समय ही ऐसी आदत डालनी पर पाखाना उतरने लगेगा। छोटे बच्चों को आरम्भ
चाहिए। यदि एक ही बार शौच जाना हो, तो उसके लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। विद्यार्थियों को विशेष कर सुबह सोकर उठते ही सबसे पहले शौच जाना चाहिए। दो बार जाना पड़े तो सुबह-शाम जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब भी शौच जाने की इच्छा हो, तो उसे दबाना नहीं चाहिए। नियम समय पर या इच्छा होने पर शौच न जाने से कोष्ठबद्धता, कब्जियत, मंदाग्नि और गैस बनना आदि रोग हो जाया करते हैं। कब्ज होने से जीभ पर मैला फफूडन छा जाता है, भूख मर जाती है, सिर में दर्द होने लगता है, स्वभाव रूखा-चिड़चिड़ा और खिन्न हो जाता है। तब मन का उत्साह मर जाता है। पाखाना फिरने के लिये पुराने लोग खुले मैदान को पसन्द करते थे। अब गाँवों तक में जगह नहीं रही, इसलिये नये ढंग से पाखाना बनाना आवश्यक हो गया है। नये ढंग में फ्लश का संडास सर्वश्रेष्ठ होता है। जहाँ फ्लश के पानी बहने के लिए जमी दस्त गटर न हो, वहाँ दो हौज बनाने से दुर्गन्ध रहित शौचालय बन जाता है। पुराने कस्बे या शहरों के शौचालय तो नरक का दृश्य उपस्थित करते हैं। ये रोगाणुओं के भण्डार होते हैं। भयानक दुर्गन्ध सारे घर का वातावरण दूषित कर देती है। यूरोप-अमेरिका में तो सोने के स्थान से भी स्वच्छ शौचालय बनाते हैं। इसलिये वे लोग स्वस्थ भी हैं। अब भारतवासी भी स्वास्थ्य पर विचार करके स्वच्छ शौचालय बनाने लगे हैं। पुराने और दुर्गन्धयुक्त शौचालयों में फिनाइल, ब्लीचिंग पाउडर, चूना या राख नियमित रूप से छिड़क कर सफाई की जाय, तो वे भी अच्छे रह सकते हैं | देहातों में स्त्रियों को पाखाना फिरने का बहुत कष्ट है। अब सभी जगह ग्राम-पंचायतें हो गयी हैं, उनको प्रत्येक गाँव में इनके लिये उचित प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये। स्वच्छ पेय जल तथा स्वच्छ शौचालय स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है।
संडास हो या मैदान, शौच का स्थान ऐसा होना चाहिये, जिससे मन सुस्थिर और सहज प्रसन्न रह सके। मन की सुस्थिर और एकाग्र अवस्था में ही शौचक्रिया ठीक प्रकार से होती है। आजकल के नये पढ़े-लिखे लोगों को शौच में बैठकर कुछ पढ़ने या सोचने की आदत पड़ गई है। यह आदत अत्यन्त बुरी है। शौच के समय सारा ध्यान केवल मल त्यागने की ओर ही केन्द्रित रहना चाहिए, तभी पाखाना साफ होता है। शौच-क्रिया के लिए पाश्चात्य सभ्यता का कमोड वाला ढंग हमारे लिए अच्छा नहीं है। खुड्डी पर उकडूं बैठकर ही पाखाना करना चाहिए। इससे जाँघों का जोर पेट और मलाशय पर पड़ता है, उस दबाव के मल शीघ्र और आसानी से उतर जाता है। मल त्यागते समय बहुत जोर नहीं लगाना चाहिए। बार-बार काँखने से आँतों पर अनुचित भार पड़ता है, गुदा को भी हानि होती है और बवासीर
आदि रोग उत्पन्न होते हैं। मल त्यागते समय पेट को भीतरी ओर संकुचित करने से आसानी से मल बाहर निकल जाता है।
जिन्हें प्रातःकाल उठते ही दस्त साफ न होता हो, उन्हें बिस्तर से उठते ही तत्काल खूब कुल्ला करके प्रकृति के अनुकूल ठंडा या गर्म पानी एक गिलास पीना चाहिए। थोड़ा टहलना चाहिये। पानी से आँते साफ होगी,

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