इसी स्थान पर गिरी थी सती की आंख, जानें पहुंचने के रास्ते

धर्मशास्त्र- पौराणिक मान्यता के प्राचीन काल में नैनीताल के एक स्थान पर महर्षि अत्रि, पुलस्त्य और पुलह ने तपस्या की और मानसरोवर से जल लाकर एक सरोवर का निर्माण किया. जिसे त्रिऋषि सरोवर कहा जाता था.

इसी स्थान पर गिरी थी सती की आंख, जानें पहुंचने के रास्ते

आज उस सरोवर को नैनी झील के नाम से जाना जाता है. इस पवित्र झील के एक सिरे पर स्थित है मां नैना देवी का मंदिर है. कथानुसार अपने पिता राजा दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ में अपने पति शिव के आगमन से आहत होकर उमाजी यज्ञ के हवन कुंड में सती हो गई. सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर डाल शिव जी आकाशगंगा से चल पड़े. इस यात्रा के दौरान जहां- जहां सती के अंग गिरे वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए. इस शक्तिपीठ की संख्या 51 है, जिस स्थान पर सती की बाई आंख गिरी थी. वही स्थान नैना देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

एक मान्यता यह भी है कि सती की आंख गिरने से ही नैनी झील थी. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि नैनीताल का नैना देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और नैना देवी इस शहर की कुलदेवी है. मंदिर परिसर में जैसे ही प्रवेश करेंगे बायीं तरफ बजरंगबली नजर आएंगे, मुख्य परिसर में मां के दर्शन से पहले श्रद्धालुओं का सामना दो सिंहों से होता है. मुख्य परिसर में तीन प्रतिमाएं हैं. मां नैना देवी, उनकी बाईं तरफ मां काली और दाहिनी तरफ गणेश जी.

नैना देवी को दो नैनों के माध्यम से दर्शाया गया है. मुख्य मंदिर के सामने तीन विशाल घंटे लगे हैं. मुख्य मंदिर भवन से ठीक सामने काले पत्थर से निर्मित एक सुंदर शिवलिंग भी है. कहा जाता है कि यह मंदिर 15वीं शताब्दी में बना था. लेकिन 1880 में एक भूस्खलन के कारण गिर गया. सन 1883 में इसका पुनः निर्माण कराया गया. यहां वसंत और शारदीय नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक हो जाती है. सावन में भी भारी संख्या में भक्त आते हैं. आपको बता दें कि मंदिर सुबह 6:00 बजे खुलता है.

कैसे पहुंचे- नैनीताल का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है. जहां से नैनीताल करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां से आप बस या टैक्सी लेकर जा सकते हैं. दिल्ली से टैक्सी से नैनीताल जा सकते हैं.

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