जानिए- कितने बीमारियों को जड़ से खत्म करता है गिलोय, जिसकी वजह से आयुर्वेद ने इसे मान लिया अमृत

कल्याण आयुर्वेद- गिलोय या गुरुची जिसका वैज्ञानिक नाम टीनोस्पोरा कोर्डीफोलिया है. गिलोय का आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण स्थान है. आपको बता दें कि गिलोय के पत्ते पान के पत्ते की तरह होते हैं. हालांकि आयुर्वेद में इसे कई नामों से जाना जाता है जैसे- अमृता, गुडूची, छिन्नरुहा, चक्रांगी, गुरीच इत्यादि.

जानिए- कितने बीमारियों को जड़ से खत्म करता है गिलोय, जिसकी वजह से आयुर्वेद ने इसे मान लिया अमृत

गिलोय एक दिव्य औषधि है. इसके सही सेवन से आपको नई जिंदगी प्राप्त हो सकती है. यह लगभग भारत के हर क्षेत्र में उपलब्ध होती है. इसके खास गुणों के कारण इसे अमृत के समान आयुर्वेद में माना जाता है. इसीलिए इसे अमृता के नाम से भी जाना जाता है.

हिंदू शास्त्रों की मने तो कहा गया है कि सागर मंथन के समय जो अमृत मिला तो वह अमृत की बूंदें जहां- जहां गिरी वहां से गिलोय पैदा हुई. प्राचीन काल से ही इन पत्तियों का उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक दवाइयों में एक खास तत्व के रूप में किया जाता है.

आयुर्वेद में गिलोय बुखार की सबसे अच्छी दवा के रूप में मानी जाती है. इसके प्रयोग से कैसा भी और कितना भी पुराना बुखार हो, इसके रोजाना सेवन से सब दूर हो जाता है. गिलोय की लता पार्क में, घरों में, जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतया कुंडलाकार चढ़ती पाई जाती है. यह पत्तियां नीम और आम के पेड़ों के आसपास अधिक पाई जाती है. जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है. उसके गुण भी इसमें सम्मिलित रहते हैं. इस दृष्टिकोण से नीम पर चढ़ी सबसे उत्तम मानी जाती है.

गिलोय की पत्तियों और तनों से सत्व निकालकर इस्तेमाल में लाया जाता है. गिलोय को आयुर्वेद में गर्म तासीर का माना जाता है. यह तैलीय होने के साथ-साथ स्वाद में कड़वा और हल्की झनझनाहट लाने वाली होती है. अगर आप सुबह उठकर गिलोय की छोटी सी डंडी को चबा- चबाकर खा लेंगे तो आपके लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं काम करेगी और कैसा भी असाध्य रोग हो उसे चुटकी बजाते ही यह खत्म कर देगी.

आयुर्वेद के अनुसार गिलोय में अनेकानेक गुण समाए हुए हैं. गिलोय शरीर के तीनों दोषों वात, पित्त और कफ को संतुलित करती है और शरीर का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है. इसमें सूजन कम करने, शुगर को नियंत्रित करने, गठिया रोग से लड़ने के अलावा शरीर शोधन के भी गुण पाए जाते हैं.

गिलोय के इस्तेमाल से सांस संबंधी रोग जैसे दमा और खांसी में काफी लाभ होता है. गिलोय का उल्टी, बेहोशी, पीलिया, धातु विकार, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, चर्म रोग, झाइयां, झुर्रियां, कमजोरी, गले के संक्रमण, खासी, विषम ज्वर नाशक, टाइफाइड, मलेरिया, डेंगू, पेट क्रीमी, पेट के रोग, सीने में जकड़न, जोड़ों में दर्द, रक्त विकार, न्यून रक्तचाप, हृदय की कमजोरी, लिवर, किडनी रोग, रक्तशोधक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला, गैस, बुढ़ापा को रोकने वाली, खांसी मिटाने वाली, भूख बढ़ाने वाली प्राकृतिक औषधि के रूप में गिलोय का प्रयोग होता है.

गिलोय नीम और आंवला के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने से त्वचा संबंधी रोग जैसे एक्जिमा और सोरायसिस दूर किए जा सकते हैं. गिलोय को खून की कमी, पीलिया और कुष्ट रोगों के इलाज में भी कारगर माना जाता है.

नोट- उपर्युक्त रोगों को दूर करने के लिए आयुर्वेद में अलग-अलग जड़ी- बूटियों के साथ गिलोय के प्रयोग के बारे में बताए गए हैं. इसलिए प्रयोग से पहले किसी योग्य वैध की सलाह जरूर लें. धन्यवाद.

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