गाय और भैंस दोनों ही दूध देती हैं लेकिन गाय को पूजनीय क्यों माना जाता है? जानिए विस्तार से

बाजार में गाय और भैंस दोनों का ही दूध आसानी से मिल जाता है. गाय कम मात्रा में दूध देती है जबकि भैंस अधिक मात्रा में. इतना ही नहीं गाय जल्दी बीमार पड़ जाती है जबकि भैंस जल्दी बीमार नहीं पड़ती है. इंसान दोनों के दूध का उपयोग भी करता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि केवल गाय को ही पूजनीय पशु क्यों माना गया है भैंस को क्यों नहीं?

गाय और भैंस दोनों ही दूध देती हैं लेकिन गाय को पूजनीय क्यों माना जाता है? जानिए विस्तार से

चलिए जानते हैं विस्तार से-

गाय और भैंस के दूध में अंतर-

गाय का दूध भैंस के दूध से उत्तम होता है विशेषकर छोटे बच्चों के लिए. क्योंकि गाय का दूध जल्दी पच जाता है. भैंस के दूध के मुकाबले गाय के दूध में पौष्टिकता भी अधिक होता है. प्राचीन काल से ही लोग यह जानते थे. उस समय के बड़े परिवारों में बच्चे अनेक होते थे. परंतु अधिक दूध की आवश्यकता होने पर भी लोग 2-3 गाय पाल लेते थे. लेकिन एक भैंस नहीं पालते थे. आज के डॉक्टर भी यही कहते हैं कि यदि नवजात शिशु को मां का दूध नहीं मिल पाए तो वह गाय का दूध अथवा pasteurized दूध पिलाने की सलाह देते हैं. उस समय की कथा कहानियों में भी गाय पालने का विवरण मिलता है. भैंसे पालने का नहीं. श्री कृष्ण की कथा में भी गाय पालने का जिक्र आता है. भैंस का दूध, मक्खन, घी और मिठाइयों के लिए अधिक उपयुक्त है.

कृषि कार्य में गाय और भैंस का महत्व-

गाय की यदि बछिया हो तो बड़ी होकर गाय बन जाती है और बछड़ा हुआ तो बैल बन जाता है. ट्रैक्टरों के आने से पहले खेती में बहुत ही अहम भूमिका निभाते हैं. प्रेमचंद की कहानियों में भी आपने पढ़ा होगा कि किसान अपने घर के भांडे- बर्तन बेचने को तैयार हैं, लेकिन बैलों को नहीं क्योंकि इन्हीं की मदद से ही वह अगले वर्ष नई फसल उगा कर पुरानी कर्ज चुका पाता था. फालतू पशुओं के बच्चे काम नहीं आते शिवाय गाय के. भैंस का हो या बकरी का थोड़ा बड़ा होते ही वह काट कर ( गोश्त के लिए ) बेच दिया जाता है.

गाय और भैंस के गोबर में अंतर-

गाय का गोबर भी बहुत ही शुभ माना जाता है. गाय के गोबर सुखा कर जलाने के काम में आते थे जो कि लकड़ियों के साथ उस समय प्रमुख इंधन थे. इसके अलावा अतिरिक्त कच्चे घरों के फर्श पर और कभी-कभी दीवारों पर भी गोबर का लेप किया जाता था. इससे कीड़े- मकोड़े नष्ट हो जाते थे. भैंस का गोबर कीटाणुओं को नष्ट नहीं करता है. हां भैंस का गोबर उपले बनाकर जलाया जा सकता है?

गाय और भैंस के मूत्र में अंतर-

गाय का मूत्र औषधीय गुणों से भरपूर होता है, अनेक आयुर्वेदिक दवाइयों में इसका प्रयोग होता है. जैसे- दम्मा, जोड़ों का दर्द इत्यादि. घर में गाय के मूत्र का छिड़काव भी किया जाता था. लेकिन भैंस के मूत्र का कोई उपयोग सदियों से नहीं किया जाता है.

खेत के लिए गाय और भैंस का अन्य उपयोग-

खाद- जितना भी गोबर बच जाता है उसकी खाद बना दी जाती थी. कुछ दशकों पूर्व तक रासायनिक उर्वरक का बहुत गुणगान होता था. लेकिन अभी प्रमाणित हो गया है कि जहां गोबर की खाद मिट्टी को उपजाऊ बनाती है वहीं रासायनिक खाद खड़ी फसल के फल को तो बड़ा कर देती है. लेकिन जमीन को बंजर बना देती है. जिससे अगली फसल बहुत कमजोर हो जाती है. उन दिनों कोई ऐसा घर नहीं होता था जिन के द्वार पर दो-तीन गाय बंधी हुई नहीं रहती थी.

शास्त्रों के अनुसार-

शास्त्रों में गाय की पूजा करने से सुख- समृद्धि आती है. कहा जाता है कि जहां गाय बंधी रहती है वहां हमेशा सकारात्मक ऊर्जा बना रहता है और वास्तु दोष भी दूर रहता है. इतना ही नहीं शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि गाय में सभी देवी- देवताओं का वास होता है. लेकिन भैंस का शास्त्रों में इस तरह का कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता है. इसलिए ही गाय को पूजनीय माना जाता है.

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