ल्यूकोरिया ( श्वेत प्रदर ) को जड़ से खत्म करने के घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

 कल्याण आयुर्वेद- वर्तमान समय में आहार-विहार का असंयम बहुत बढ़ गया है. जिसकी वजह से पुरुषों में तो प्रमेह आदि रोग होते ही हैं. महिलाएं भी पुरुषों की उस श्रृंखला से अथवा अपनी मिथ्या धारणादि से प्रदर प्रवृत्त रोगों का शिकार बन जाती है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उनके रोगों के लिए पुरुष समाज ही उत्तरदाई है. बल्कि उनकी स्वयं की भूले भी अनेक रोगों की उत्पत्ति में सहायक होती है. 

ल्यूकोरिया ( श्वेत प्रदर ) को जड़ से खत्म करने के घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय
प्रदर एक ऐसा रोग है जो अधिक कामसूत्र नवयुवतियों में पाया जाता है.

जिसके विषय में संकोच या लज्जा बस किसी को नहीं बता पाती है और चुपचाप रोग की वृद्धि सहन करती रहती हैं. पति भी अनभिज्ञ रहता है तो रोग बढ़ता हुआ दु:साध्य रूप धारण कर लेता है. चिकित्सा शास्त्र में उनके निवारण के लिए अनेक उपचारों का निर्देश तथा योग करने के लिए बताया गया है.

ल्यूकोरिया के लक्षण-
शारंगधर ने चार प्रकार की प्रदर रोगों की चर्चा की है वात, पित्त, कफ और त्रिदोष से उत्पन्न प्रदर उनमें रक्तप्रदर भी शामिल है.
वातजन्य प्रदर में रुक्ष, लाल जाटदार तथा मांस के जल के समान अल्प स्राव होता है.
पीतजन्य प्रदर पीला, नीला, काला, लाल, गर्म तथा पित्त मिश्रित स्राव अधिक होता है.
कफजन्य प्रदर में आंव के समान चिकना, उज्जवल तथा पीलापन लिए हुए मांस के जल के समान स्राव होता है. इसे श्वेत प्रदर कहते हैं.
सन्निपातजन्य प्रदर में शहद व हरताल तथा चर्बी के वर्ण का शव जैसी दुर्गंध वाला स्राव होता है. इसमें तीनों दोष सम्मिलित होते हैं और तीनों दोषों के लक्षण सामने आते हैं.
लेकिन एक मत यह भी है कि योनि से स्राव स्वाभाविक रूप से भी होता है. किंतु उस संभावित स्राव का कार्य योनि को नम तथा कोमल बनाए रखना है. जो लोग इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते हैं और उसे रोकने का विचार रखते हैं वे वास्तव में बहुत बड़ी भूल करते हैं. किसी भी प्राकृतिक क्रिया में जाने-अनजाने हस्तक्षेप का प्रतिफल नुकसानदायक भी हो सकता है.
ल्यूकोरिया होने के कारण-
1 .योनि दोष से उत्पन्न प्रदर जिसमें अधिक संसर्ग आदि कारणों से योनि में प्रदाह होने लगता है अथवा योनि में भ्रंश व अन्य किसी प्रकार का प्रदूषण.
2 .गर्भाशय ग्रीवा की रोग नवीन या पुराना ग्रीवा प्रदाह गर्भाशय ग्रीवा में व्रण या क्षत अथवा ग्रीवा का बाहर की ओर झुकाव.
3 .जीर्ण गर्भाशय प्रदाह जिसमें शूल, स्राव, शोथ आदि भी हो सकता है.
लेकिन आवश्यक नहीं है कि प्रदर के कारणों में उक्त कारणों को ही प्रमुख माना जाए क्योंकि उक्त उपद्रव में प्रदर स्वयं भी उनका कारण बन सकता है. इसलिए मानना होगा कि यह सभी उपद्रव अथवा व्याख्या परस्पर में अन्योन्याश्रित संबंध रखती है.
4 .प्रदर की उत्पत्ति के विषय में चरक का कहना है कि अधिक खट्टे, खारे, भारी, कड़वे, विदाही, स्निग्ध ग्राम्य और उत्पादक पशुओं के मांस, सुरा, बिष आदि के अधिक सेवन से वायु कुपित होकर गर्भाशय की रजोवाहिनी शिराओं में रक्त के साथ पहुंचकर रज को प्रभावित करता है. उसे प्रदर कहते हैं.
5 .अन्य कारणों में विरुद्ध आहार- विहार, उपवास, अत्यंत श्वेद, स्राव, शूल आदि के कारण स्राव में वृद्धि हो जाती है. उत्तेजक दृश्यावलोकन, अश्लील वार्तालाप, अधिक मद्धपान का सेवन, विपरीत रति, ज्यादा संभोग, रोग ग्रस्त पुरुष के साथ संभोग करना आदि के कारण हो सकते हैं.
6 .मैथुन के अंत में स्वच्छता के प्रति उपेक्षा रखते हुए योनि का प्रक्षालन न करने से भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है.
ल्यूकोरिया के प्रकार-
आयुर्वेदोरक्त चार कारणों अथवा आधुनिक चिकित्सकों द्वारा निश्चित किए यह तीन कारणों को जनसामान्य नहीं जानते हैं. इसलिए इस रोग की प्रसिद्ध ही दो ही रूप में है. पहला श्वेत प्रदर और दूसरा रक्त प्रदर . चिकित्सा जगत में भी उपचारार्थ यही भेद अधिक स्वीकार्य है. क्योंकि श्वेत प्रदर में श्वेत या पीलेपन का स्राव होता है. जबकि रक्त प्रदर में लाल रंग का स्राव होता है.
ल्यूकोरिया रोग का प्राथमिक उपचार-
इन सब में प्रारंभिक चिकित्सा के रूप में योनि प्रक्षालन की ओर सर्वप्रथम ध्यान दिया जाता है. योनि प्रक्षालन सर्वोत्तम तो फिटकिरी का घोल है. इसके लिए 2 तोला फिटकिरी का घोल बनाकर दिन में दो बार उससे योनि को धोना चाहिए अथवा श्वेत फिटकिरी के साथ सुहागा या बोरिक एसिड मिलाकर भी योनि प्रक्षालन करना अति उत्तम है. तक्र से अथवा दही के तोड़ से भी प्रक्षालन किया जा सकता है. किंतु यह फिटकिरी के घोल जैसा कार्य प्रायः नहीं कर पाते हैं. यदि नारायण तेल का प्रयोग किया जाए तो उससे अधिक लाभ हो सकता है.
ल्यूकोरिया रोग का आयुर्वेदिक इलाज-
ल्यूकोरिया का सरल अनुभूत योग-
1 .शकरकंद और जिमीकंद बराबर मात्रा में लेकर छाया में सुखा लें. अब इसे पीसकर पाउडर बनाकर सुरक्षित रख लें. 5-6 ग्राम तक पानी या बकरी के दूध अथवा अशोक छाल के क्वाथ के साथ सेवन करें. यह सब प्रकार के प्रदर में अत्यंत लाभदायक है.
2 .प्रदर रोग चूर्ण-
दारूहल्दी, बबूल का गोंद और शुद्ध रसायन 10- 10 ग्राम, पीपल की लाख, नगर मोथा और सोना गेरू 5- 5 ग्राम तथा मिश्री 20 ग्राम सभी को कूट पीसकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें. अब 2 से 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से किसी भी तरह का प्रदर रोग ठीक हो जाता है.
3 .श्वेत प्रदर पर उत्तम योग-
मोचरस, अनार की कली और ढाक का गोंद 10-10 ग्राम, पठानी लोध और समुद्र शोष 40- 40 ग्राम तथा मिश्री 50 ग्राम सबको कूट पीसकर सुरक्षित रख लें. अब 6 से 12 ग्राम की मात्रा में मिश्री युक्त गर्म दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से श्वेत प्रदर नष्ट होते हैं.
4 .सब प्रकार के प्रदर पर-
गोखरू, पापड़िया तथा कतीरा गोंद और सेलखड़ी बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें. अब 5 से 10 ग्राम तक बकरी के दूध के साथ सेवन कराएं. इससे सब प्रकार के प्रदर रोग से छुटकारा मिलती है.

श्वेत प्रदर ( ल्यूकोरिया ) का घरेलू इलाज-

1 .चौलाई की जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम की मात्रा में चावल के धोवन में शहद मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है.
2 .त्रिफला, मुलेठी, नागर मोथा और दूध के चूर्ण को शहद में मिलाकर सेवन करने से वातक प्रदर में लाभ होता है.
3 .मुलेठी, शंख जीरा, नीलकमल और काला नमक दो- दो रत्ती लेकर मिला लें. यह एक मात्रा है इसे दही और शहद के साथ सेवन करने से प्रदर रोग नष्ट होता है.
4 .वासा स्वरस मधुमेह मिलाकर सेवन करना चाहिए. गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है.
5 .कुशा की जड़ चावल के धोवन के साथ पीसकर पिलाने से सब प्रकार का प्रदर रोग नष्ट होता है.
6 .दारूहल्दी, रसौत, वासा, नागर मोथा, चिरायता, बेल की गिरी, शुद्ध भलान्तक और कुमुद बराबर मात्रा में लेकर को क्वाथ बनाएं. अब इसे शहद के साथ पीने से सब प्रकार के पीले, काले, नीले, लाल अथवा श्वेत प्रदर रोग नष्ट होते हैं. अति पीड़ा युक्त प्रदर में भी फायदेमंद है.
7 .कठूमर के फल के स्वरस में मधु मिलाकर पिलायें. इससे रक्त प्रदर दूर होता है. इस औषधि सेवन के दौरान रोगी को केवल दूध चावल और शर्करा ही खाने का निर्देश देना चाहिए.
8 .कुशा की जड़, खरैटी की जड़ के चूर्ण को चावल के पानी के साथ खिलाने से रक्त प्रदर में लाभ दायक है. अथवा केवल खरैटी की जड़ का कल्क बनाने और उसे दूध में डालकर गर्म करके पिला दें. इससे रक्त प्रदर दूर होगा.
9 .बेर का चूर्ण गुड़ में मिलाकर रक्त प्रदर में सेवन करने से अच्छा लाभ होता है. लाख का चूर्ण गोघृत में मिलाकर खिलाने से रक्त प्रदर में लाभ होता है.
10 .आंवले के बीजों का कल्क शर्करा और शहद के साथ सेवन कराएं. इससे भी प्रदर में लाभ होता है.
11 .छिलके उतारे हुए भुने चने भाड़ पर भुने हुए लेकर चूर्ण करें और उसमें बराबर मात्रा में मिश्री का चूर्ण मिलाकर 6-6 ग्राम की मात्रा में ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है.
12 .श्वेत जीरा का चूर्ण 2 ग्राम मिश्री 1 ग्राम का चूर्ण कड़वी नीम की छाल के काढ़े में शहद मिलाकर सेवन कराने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है.
13 .गूलर का पका हुआ फल, साबुत खाकर ऊपर से ताजा पानी पिए. श्वेत प्रदर के लिए फायदेमंद होगा.
12 .मोचरस का 1 ग्राम चूर्ण बकरी के दूध के साथ श्वेत प्रदर ग्रस्त रोगी को सेवन कराना चाहिए.
13 .आंवले का चूर्ण 3 ग्राम मधु के साथ सेवन करने से लाभ होता है.
14 .कपास की जड़ का चूर्ण चावल के धोवन के साथ दें अथवा कपास की जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीसकर पिएं. श्वेत प्रदर में यह फायदेमंद होगा.
15 .माजूफल का चूर्ण 1 से 2 ग्राम तक की मात्रा में पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है.
16 .श्वेत मूसली का चूर्ण 3 ग्राम आंवला पानक के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर दूर होगा.
17 .नागकेसर का चूर्ण 3 ग्राम ताजा पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है. अनार के पत्ते 20 ग्राम काली मिर्च 5 नग, सौंफ 1 ग्राम पानी के साथ पीसकर खाने और सुबह खाली पेट पीने से प्रदर रक्त प्रदर तथा उनके उपसर्ग को दूर करता है.
18 .पुनर्नवा पंचांग 3 ग्राम, भृंगराज 2 ग्राम, मिश्री 5 ग्राम का पाउडर के पानी के साथ दें. प्रदर तथा गर्भाशय के विकार और शोथ में लाभदायक है.
19 .बड़ी इलायची 10 ग्राम, छोटी इलायची 5 ग्राम, दालचीनी 1 ग्राम को पीसकर चूर्ण बना लें और इसे चार भागों में बांट लें. अब इसमें थोड़ा मिश्री मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर ठीक होता है.
20 .केले की पक्की फली का सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है. इसके लिए फली पर छोटी इलायची का चूर्ण बुरक देना चाहिए.
21 .नीम का तेल एक चम्मच चौगुनी गाय के दूध में मिलाकर सेवन कराएं. ऊपर से मिश्री मिला हुआ दूध पिलायें. इससे प्रदर के सभी उपसर्ग तथा विषैला प्रभाव नष्ट होता है.
22 .हंसपदी का चूर्ण दही में मिलाकर सेवन करना श्वेत प्रदर में फायदेमंद होता है.
23 .श्वेत चंदन और मिश्री बराबर मात्रा में मिलाकर दूब के रस के साथ सेवन करने से दोनों प्रकार के प्रदर ठीक होते हैं.
24 .सूखा सिंघाड़ा चूर्ण करके रखें और 3-3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करें. सब प्रकार के प्रदर में लाभदायक है.
25 .ऊन की भस्म और मिश्री बराबर मात्रा में 5 ग्राम चूर्ण को गाय के दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से श्वेत प्रदर दूर होता है.
26 .शकरकंदी को छाया में सुखाकर सेवन करना श्वेत प्रदर में लाभदायक होता है. इसे 3 से 5 ग्राम तक की मात्रा में ताजे गाय के दूध के साथ सेवन करना चाहिए.
27 .अश्वगंधा और शतावर बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें. अब 3 ग्राम की मात्रा में ताजा पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें. यह प्रदर रोग को ठीक करने में मददगार होता है.

नोट- 
यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है किसी भी प्रयोग से पहले आप डॉक्टर की सलाह जरूर लें.

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